Wednesday, September 7, 2016

आखिरी साँझ

पतझड़ की आखिरी साँझ,
और पेड़ के आखिरी पत्ते के आखिरी छोर की वेदना!
तुम्हारी वेदना टूट-टूटकर जीर्ण हो गई है?
लहरों की ठेल से बिखरते किनारे की तरह?
आधे टूटे पत्थरों के जर्जर मकान में कैद?
सुना है तुम्हारी सांसों से वही पुरानी गंध आती है,
वही पुराने अश्रु अब पीले पड़ गए हैं....
और कल,
नई आभा खुलने को है।                
क्या तुमने केसर बीनकर अपनी हथेलियों पर जमा किया है?
अपनी उन्मुक्त सखा को नेत्रों में भरकर आर्द्र हुए?
हाँ, जब आभा खुलेगी... तुम क्या बिखेर इतराओगे?
तुमने गति पर कोई कोई कोरी चादर ढक दी थी,
बिलकुल कोरी और निर्जीव...
तुम्हे कुछ झिलमिल तारे दीखते हैं
तुम आँखों से छू लेना चाहते हो,
वही निर्जीव, कोरी चादर अब भी तुम्हे ढके है
तुम्हारी वेदना अब और जीर्ण और जर्जर होगी।

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