Friday, August 19, 2016

काँच के चूरे की खिड़की - 1

भादवे की तीखी भड़पती में सड़क ने अपनी वेदना सूखा ली है... अब बिलकुल शांत, निश्चल करवट लिए पड़ी है। उसकी पीठ से लौहारों का एक डेरा अपने पैर समेटे टिका हुआ है। जमीन में धँसी आड़ी-तिरछी छोटी-बड़ी लकड़ियों का डेरे में खूब सम्मान हुआ है, सभी श्रृंगार में रची हुई हैं, प्लास्टिक के अधफटे काल-कलूटे त्रिपाल छितराते, बलखाते उनके आभूषण बने हैं। ऐसे ही एक त्रिपाल महल में जीवन का स्वांग खिलता जा रहा है, जितना प्रकाश बढ़ता है उतना ही इसकी रचना का विस्तार होता जाता है, अब रंग पात्रों में घुलकर और अपरिचित हो गए हैं। मुझे परिचय की कभी उत्कंठा भी नहीं रही, पर उन्होंने ‘मुझे’ घोल लिया....।

दरवाजे से लगी खाट पर एक 17 साल का लड़का मनोज घुटने मोड़े पड़ा है। त्रिपाल के एक फटे हुए कोने से उजियारा क्षीण होते-होते उसे झांक रहा है, पर ये दृष्टि उसे अखरती थी, वह विरक्ति से भर बाहर निकल आया। माई उत्साह से लकड़ियाँ चीर रही थी, आज वो शांत नहीं हैं, उनपर बिगड़ भी रहीं हैं। पास में 12 साल की मुनिया घुटने और पेट के बीच दोनों हाथ दबाए बैठी है। जब भी भूख उसे मलीलती है वह इसी तरह सिमट कर अपनी आँतों को सहेजे रखती है। कहती है वह ऐसे ना बैठे तो उसे ताप चढ़ जाएगा, इस पर माई वेग में कहती है “सारे दिन कूदती फिरती है, तब ताप नहीं आता तुझे...”। पूरे दो दिन बाद चावल पकाने की तैयारियाँ चल रही थी, मुनिया के बापू चावल खरीदने गए थे, माँ ने झटपट बाकी के काम निपटा लिए हैं अब बस चूल्हा जलने की देर थी। मनोज इस उत्सव में भी ऊबने लगा था।

माई का चूल्हा खूब जल चूका था, लपटे लम्बी हो-होकर अब धीमी पड़ने लगी थी, नजरें रह-रहकर सड़क पर टिक जाती थी, उनके उत्साह का अवकाश अब चिंता और विषाद से भरता जा रहा था। मुनिया की आँखें भी उन लपटों में सूख गई, वो वहीं जमीन पर पड़कर सुबकने लगी। माई ने उसे उठाकर पुचकारा भी नहीं बस एकटक देखती रह गयी, फिर उसके पार... और फिर कुछ नहीं दीखता था... तो लुगड़ी से पोंछकर आँखें फिर सड़क पर जमा ली।

मनोज बेचैन इधर-उधर भटकता था। साँझ का उत्सव अब रात के सन्नाटे ने गलप लिया था। माई ने भारी मन से मुनिया को उठाकर खाट पर पटक दिया और मनोज के पास आ खड़ी हुई, उनका ह्रदय जोर से धडकता था जैसे अभी उछलकर बाहर आ गिरेगा। मनोज ने चुप्पी तोड़ी, ‘माई, बापू ठीक नहीं करते हैं, ऐसे कब तक सहेंगे?’ माई ने कृत्रिम क्रोध में भौंहें तान ली, ‘तेरा बाप है रे...’
‘माई, मैंने सोच लिया है मैं शहर कमाने जाऊंगा... ’
‘टांगे तोड़ दूंगी तेरी, शहर का नाम लिया तो... ’
‘अब और तुझे और मुनिया को भूखा नहीं मरने दूंगा...’
‘इतनी अक्ल है तो दो-चार खुरपी पीटकर यहाँ गाँव में क्यों नहीं बेच के आता?’
‘माई, दो-चार रुपयों से कब तक गुजारा होगा? बापू भी तो यही करते थे ना लड़कपन में? कुछ हुआ क्या?.... फूफा कहते थे ... शहर में... ’
माई की आँखों में शून्य नाचने लगा, रुलाई का बाँध रिस-रिस कर फूटने को हुआ। मनोज अपने वेग में बोलते चला जा रहा था, उसके शब्द माई के कानों में गर्जना कर फूटते थे।
‘माई.... क्या हुआ माई....’
‘बेटा मैं तेरे हाथ-पाँव जोडती हूँ तू शहर जाने की बात मत किया कर...’
‘तू तो खामखाह डरती है... ऐसे कब तक घर में बांधे रखेगी...’
‘मनोज, तू भी अपनी माई को दुःख देता है?’
‘नहीं माई मैं तो तुझे सुख देना चाहता हूँ, खूब सारा पैसा.... फिर मुनिया कभी भूखी नहीं रहेगी...’
माई संभलकर स्थिति में लौटी, मुनिया को लक्ष्य कर देखने लगी, तभी सड़क पर किसी-के बडबडाते हुए आने की आवाज आई।

माई झपटकर एक अधेड़ आदमी का कन्धा पकड़कर उठाती है। मनोज आवेश में पैर पटककर वहीं खड़ा रहता है। माई उसे उम्मीद से देखती है... पर उल्टा वह तो अपने बापू को भला-बुरा कहने लगा। इस बीच बापू ने उल्टी भी कर दी, और सर पकड़ वहीँ सड़क पर बैठ गए। माई जैसे अचेतन हुए जा रही थी, उनके हाथों की शक्ति क्षीण हुई लगती थी, कभी अपने पति की लड़खड़ाती हालत देखती थी कभी अपने बेटे को बडबडाहट सुनती थी, जैसे वो भी वहीँ सड़क पर निष्प्राण बैठी रह जाएँगी।
पहले की भांति दिन निकलने लगे, कभी भूखे सोए तो कभी दाने गले से उतार लिए। माई की तपस्या से चार जीव जीते थे। पर इस घटना के बाद कुछ दिनों तक उनका मन भारी रहा, हालाँकि ऐसे तो ये घटना कुछ नयी भी नहीं थी, पर ऐसा पहली बार हुआ जब मनोज ने अपने बापू को भला-बुरा कहा हो।

मैं बुनाई को जितना उधेड़ता हूँ, ये उतनी ही उलझती जाती है, घनी होती जाती है, कहीं छोर नहीं है हो भी नहीं सकता, तो मैं छेड़ता ही क्यों हूँ? मुझे भ्रम था कि... वेदनाओं को सहकर, यातनाओं को पीकर इस अनुभव से मनुष्य पार पा जाता है, सख्त हो जाता है, सहनीय हो जाता है, उसके प्रभाव से मुक्त हो जाता है... अब नहीं है... शायद मानवी मन की सत्ताओं को सूखे तर्क से समझना आसान नहीं है... शायद असंभव ही है।     

मनोज ने भी भाँप लिया कि माई का मन दुखता है। एक दिन बात चला बैठा, “अब तू ही बता माई मैंने कुछ गलत कहा? ये कोई अच्छी बात है, चार पैसे कमाते हैं आठ खुद के लपेट लेते हैं?”
“अपने बाप को कोई गालियाँ देता है क्या?” माई आवेश में बोली।
“सच कहता हूँ माई मुझे बस तेरी और मुनिया की चिंता है, मैं तो कहता हूँ उनकी ज्यादा देखरेख मत किया करो, दो दिन कोई नहीं पूछेगा अपने आप अक्ल आ जाएगी...”
माई पूरी तरह से काँप गई, मनोज के घृणा भरे शब्द जैसे उनके मन को छील डालेंगे।
एक दिन मुनिया के बापू मारपीट करने लगे।
इस घटना पर मनोज फूट पड़ा, “मैं अब नहीं रहूँगा इस डेरे में....”

मनोज सड़क के किनारे-किनारे बढ़ता जा रहा था, उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थी, श्वास उबलने को थी, पसीने के लथपथ। पीछे माई रोती हुई भागती थी, उनका दम उखड़ने को हो रहा था। पुकारती थी, ‘अरे रुक जा मेरा बेटा, मत जा, मनोज... रुक जा,.. अरे मेरे खातिर तो रुक जा...’ पर मनोज को क्रोध चढ़ता जा रहा था, वो चलता रहा ...पीछे मुड़कर देखा भी नहीं।
कुछ देर में सब ओर स्तबधता छा गई, उसे लगा माई भागते-भागते गिर गई हैं, एक क्षण के लिए ठिठककर मुड़ा, माई वहीँ सड़क पर माथा पकड़कर बैठ गई हैं, विवशता भरी निगाहें बस मनोज को देखती जा रही हैं . . . . मनोज को ये ठहराव भी अखरता था। वो तेज़ी से शहर की ओर बढ़ गया। 

सोचता हूँ सत्य पूरा भरा हुआ तो नहीं हो सकता, पर अवकाश है भी तो किसके लिए? मैं सूर्यदेव के शासन में बैटरी थामे खड़ा हूँ, कुछ नहीं पता कहाँ इसकी किरणें विलीन हो जाती है, पर हर क्षण इससे प्रकाश तो निकलता है, यही मुझे अहसास दिलाता है कि सूर्य के प्रकाश में भी इसका योग तो हो रहा है। अब तो ऐसे सत्य, ऐसी पूर्णता में मेरा उत्साह भी नहीं रह गया है।  

शहर की दुकानें शुरू हो गई थी, जयपुर की ओर आते एक ट्रक में मनोज बैठ गया था, डेरे से मुख्य शहर अधिक दूर नहीं था, सांझ होते-होते पहुँच गया। एक बार तो मनोज का जी हुआ कि अभी घर भाग चले, रह-रहकर माई की पुकार कानों में गूंजने लगती थी। एक बड़े से मार्केट का रास्ता बताकर ट्रकवाले ने उसे उतार दिया।
मनोज का उत्साह घुलने लगा था, वो दिशाहीन मार्केट की गलियों में घूमने लगा। रास्ते में दुकानों को देखता, लोगों की चाल-ढाल जल्दबाजी पे हैरान होता, भीडभाड में घुटता हुआ-सा, चलता जा रहा था। कहीं भी किसी महिला का विवशता भरा मुख देखता, उसका मन भर आता था।
रात को एक पुलिये की पगडण्डी पर जा सो गया। रात को सपना देखता है। ‘माई खाट के के पाये के पास बैठी रो रही है, मनोज पूछता है ‘क्या हुआ माई रोती क्यों है?’ माई पूरे मुहँ को सख्ती से पोंछकर कहती है, ‘मेरी माँ भी मर गई, अब बाप भी मर जाएगा। कौन ध्यान रखने वाला है उसका? मैं होके आउंगी एक बार वहाँ ...’

अगले दिन एक-एक दुकान में नौकरी के लिए भीख मांगी। कहीं से दुत्कार दिया गया तो कहीं गर्दन हिलाकर नकार दिया गया। 2-3 दिन यही क्रम चलता रहा। चलते-चलते एक दिन मार्केट के दूसरे छोर पर थोड़े खुल्ले से ईलाके में आ गया, यहाँ इक्की-दुक्की दुकानें थी, पर बड़ी-बड़ी थी, खूब बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ खड़ी हुई थी। एक होटल की सीढ़ियों में जा टिक गया। परिवार के परिवार इसी समय खाने आ रहे थे। चहकते हुए गाड़ी से निकलकर सीढियां चढ़ते और घंटेभर बाद मुँह में कुछ चबाते हुए उतर आते। रात काफी घिर आई थी, होटल के कर्मचारी बाहर निकलने लगे थे। टाई-सूट लगाए एक आदमी आश्चर्य से उसे देखने लगा, शायद वो होटल में मैनेजर होगा, मनोज झट से उठकर उसके पास पहुँच गया।
“पहले कभी कुछ काम किया है?”
“साब, लोहे का काम किया है... पर कोई भी काम कर लूँगा साब... बस दो टेम की रोटी दे देना”
“... रहता कहाँ है?”
“साब, कहीं भी पड़ जाता हूँ, इधर कहीं जगह बता दो...”
“... ठीक है, आज से यहीं पड़ना.. कल से बर्तन मांजने का काम कर लेना... ”
मनोज के बस हाथ जुड़ गए।
होटल पर काम करते मनोज को 15-20 दिन बीत चुके थे, अब वो भरे पेट सोता था, पर पगार कुछ नहीं मिलती थी... माई की आवाज अब उसे कुरेदती थी, “अरे, रुका जा रे मनोज... ओ बेटा...”,। खुद को कोसने लगता, कितना दुःख दिया है रे तूने माई को... जानता था ना माई कितनी भावुक है, फिर भी भाग आया... वो पीछे-पीछे भागती रही... गिर गयी,.. उठकर क्या किया होगा.. क्या सोचती होगी? कितनी रोयी होगी... बार-बार मुनिया के सामने रोकर कुछ-कुछ बडबडाती होगी... मुनिया क्या समझ आएगा? हाँ, माई दुःख बांटती थी तेरे से... तू इसीलिए भाग आया? माई कैसे जीयेगी अब? और फिर मुनिया... कोई नहीं बचेगा... क्या फायदा मेरी कमाई का... और अभी तक तो एक रुपया भी नहीं मिला...। कभी-कभी वापस घर भाग जाने का मन करता था।

ह्रदय अपनी भूमि पर कितने भी बंधन लगाए, कितना भी कठोर कर ले, वेदना अपना घर खड़ा कर ही लेती है, गति से ढह भी जाते हैं, फिर बना लेती है।

आज होटल में बड़े मालिक आए थे। सब काम बड़े ध्यान से हो रहे थे। मैनेजर खुद जा-जाकर सब सब्जियाँ चखते थे, सबकी खूब भागदौड़ हुई। एक ग्राहक ने वेटर को डिश दिखाते हुए, उनके मालिक को बुलाने को कहा। वो सीधा बड़े मालिक को बुला लाया। उस ग्राहक ने सुनाना शुरू कर दिया, ‘ये क्वालिटी है तुम्हारी... इस डिश पर पता नहीं किसकी झूठी सब्जी लगी है... साफ़ भी की थी या कल वाली में डालकर दे दी... ’। मालिक को इतने अपमान की आदत नहीं थी, वे क्रोध से ला-पीला हुए जा रहे थे... किसी तरह से उस ग्राहक को समझा-बुझाकर निकल गए। उधर किसी ने मैनेजर को भी सूचना दे दी।    
मनोज अनमने ढंग से प्लेटें धो रहा था, देखता है मैनेजर के माथे में बल पड़े हुए हैं, दो चार लड़कों के साथ उसकी ओर ही आ रहा है। हाथ में एक डिश पकड़ी हुई है।
‘क..क्या हुआ साब?’
‘हरामखोर... इसलिए रखा था तुझे यहाँ... ’।
लात-घूसे पड़ने शुरू हो गए थे।
“.... मेरी नौकरी चली जाती आज... निकल जा यहाँ से... ”
मनोज धुना भी गया, बिना पगार के उसकी शहर की पहली नौकरी भी आज पूरी हो हुई थी। कुछ समय के लिए तो उसे ख़ुशी ही हुई... चलो किसी तरह पीछा छूटा। पर रात को जब भूखा सोया तो उसे सुध आई।

2 दिनों से मनोज ने कुछ नहीं खाया था, अब तो मार्केट में सबने उसे भिखारी ही समझ लिया था, लोग उसे देखते ही मुँह फेरने लगे। रात को एक फूटपाथ पर घुटने मोड़े पड़ा था, पर भूखे पेट नींद भी कैसे आती? देखता है एक औरत अपने दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ बैठी हुई। एक लड़का था मुनिया की उम्र का रहा होगा और लड़की उससे भी छोटी थी। कुछ सूखे रोटी के टुकड़े और एक बिस्किट का पुड़ा वो एक झोले में से निकलती है, दोनों को आधा-आधा बाँट के देती है... छोटा लड़का एक निस्कित निकाल अपनी माँ के मुख की ओर बढ़ा देता है, औरत के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ जाती है... आधा बिस्कुट दांतों से तोड़कर उसकी अँगुलियों को चाटने लगती है...।
मनोज के आसूँ अपने ही वेग में गिरने लगे। बच्ची ने ऊँ-ऊँ करके मनोज की ओर इशारा किया। उस औरत ने पीछे मुड़कर देखा कि कोई लड़का बैठा रो रहा है, तो उसने अंदाज लगाया कि वो भूखा है। उसने आधा भरा बिस्किट का पुड़ा देकर बच्चे को मनोज के पास भेज दिया। मनोज ने उसमें से तीन बिस्किट निकालकर खा लिए। इस बार अश्रुधारा के साथ उसके रुंधे हुए गले से निकला, ‘माई...’।

रात को तेज़ बारिश हुई... वो औरत एक फटे-पुराने कम्बल में दोनों बच्चों को किसी तरह ढके हुए थी। मनोज ने कुछ निश्चय कर उसी समय रात के अँधेरे में, बारिश में चलना शुरू कर दिया... उसके कदमों में नई शक्ति प्रतीत होती थी... वो औरत और उसके दोनों बच्चे उसे जाते देखते रहे।

मैंने खूब प्रयत्न किया कि मैं भी उसके साथ चलकर देखूं... वो कहाँ जाता है... पर मेरी दृष्टि सबकुछ  देख पा रही थी, केवल वो मार्ग इसके आगे नहीं दीखता था..। मेरे ह्रदय का कोई हिस्सा फिर ओझल हो गया, और कोई फिर से स्थिर...।        

 . . . जारी 

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