Thursday, July 21, 2016

मेरे स्थायित्व की दृष्टि

तुमने जो पाँव रखा है रेत की हथेली पर,
उसकी उँगलियों की गुदगुदाहट तुम्हें थाम लेगी
छिटक-छिटककर झर रही आँखों के अधरों से हँसी
बेवजह हँसी का अपना खुमार कितना है
बेबाक खिंची लकीरों में,                                      
कोरे कागज का श्रृंगार कितना है
केशुओं की पिघली महक से हवाओं में भरती मयकशी
हवा के हल्के स्पर्श में जीने का भान कितना है
नन्हें पत्थरों के माथे पर,
उन्मुक्त बच्चों का संसार कितना है

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