Wednesday, December 9, 2015

ज्वालदृग

आग में लथपथ,
दो ज्वालदृग,
नितभोर
बिखेर लपट,
मूँद पलक ढूंढते
सूर्यरथ,
तपाघात से
शिथिल मन,
प्रज्ञा चंचल।
मुख खोल अनल
कसता प्रत्यंग,
छटपटा  बिछ गये 
जैसे आखेट-मृग।
तिस पर भी, 
वो दृग,
नितभोर वही मद
पद-पद पे
स्वतेज़ से
सूखता रक्त।
है कहीं सूर्यरथ?
हाँ, था
एक घड़ी का दर्शन
आनंद खेलता उर में,
घन श्वेत आलोक था
दृष्टि में,
पर फिर से वही
घोर तिमिर,
वही ज्वालदृग,         
वही तेज़ लपट।
सह आघात नित,
बन आखेट मृग।
अग्नि व्यथित
पूछती ब्रह्म से,
मुझसे
निर्माण कहाँ?
हर उर में
ध्वंश,
दर्शन कहाँ?
सब लोचन.
अश्रु,        
कहाँ  सत्य?
मैं आड़ सत्य को,
कंटक
दर्शन पथ पर।
अंगार चटा तलवों से
आनंद का दमन करूँ।
मैं प्रिय हूँ किसी को
नहीं,
बस तिमिर में
जब ना आहट
सूर्यरथ की,
आलोक को बांधता
तम
तो ही
मेरा स्मरण !!


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