Monday, September 14, 2015

देख प्रलयंकार खड़ा !!

आ पापाचारी मार मुझे,
निर्दय हुंकारी बाँध मुझे,
आ रक्त देख फटती छाती का,
आ ताप देख धधकी ज्वाला का,
आँखों से फूटते अंगार देख,
गांडीव का प्रलय श्रृंगार देख,
देख लहू के सोते फूटते,
देख काल को प्राण लूटते,
रणभू घोर मेघों से अटी है
पवन-चकित बाणों से सटी है
टापों से छिटक धुन आती है
शूलों से लिपट भुन जाती हैं  
ले भाले की नोक अड़ा,
देख प्रलयंकार खड़ा !!
बाँध ज्वाल से साँसे तेरी,
ले आज युद्ध-लिप्सा मिटा दूं |
घेर सांसों में प्राण अपने,
ला फूक मार साँसे बुझा दूं |
मैं हूँ काल का कराल नाद,
मौत-भय का कर्कश संवाद
मैं पग-पग ध्वंश सजाता हूँ,
मैं रग-रग दंश चुभाता हूँ |
तोड़ कारा चट्टानों की,
तूफान से योग कराता हूँ |
मैं उग्र रंगों का शैलाब  सकल  
मैं जर्जर सुरों का गान विकल

मैं दहाड़ सिंहों की हरता हूँ,
सिसकार मृगों में भरता हूँ
माथे से लिपटी विप्लव हवाएं
मुख से बहती अग्नि-शिखाएं
आ अब दहकते राग बुझा,
गर्मी से सुलगती राख बुझा |
मैं घाव प्रचंड प्रतिघातों का
नसों से फूटता रक्त बचा,
आ प्रलय बीन पावक आँखों से,
भयकाल बीन रक्तिम शाखों से,
बिजली-से कड़कते बाज देख  
तीरों का तांडव नाच देख  
बाहों में देख, मस्तक में देख
आँखों में देख, चरणों में देख
देख मुझमे लीन भँवर,
देख मुझमे आसीन समर,
मैं बर्बर-घात को असाध्य डगर,
मैं जलती खड्ग का आघात प्रखर,
मैं तपते रन में संहारी हूँ,
मैं नाश-दूत भयकारी हूँ
जीवन के शत संग्रामों में,
मैं कर्मठ युद्धाचारी हूँ |      


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