Tuesday, December 8, 2015

उर्वशी


घन-केश श्यामल मुक्त झरते,
कज्जल से लिपटे, कहीं तारो-से उजले
झपक पलकें मौन साज
आँखों में बह जा, उर्वशी
घोल चन्दन सांस में,
एक-साँस पी जा, उर्वशी।

तरल-गीत बहा सजल-नयन,
लास पिरोते सुधि अधरों में।
चपल मुखवन, पग-पग पर रंग,
एक झंकार लिख जा, उर्वशी।
बाँध मन को मेघ-लटों से,
मधुमास भर जा, उर्वशी।

जीवन समेटे मृदु-मुस्कान,
केसर बीनती विरल किरणों से।
निष्पंद-पटल पर खींच लकीरें,
रंग-जाल बुन जा, उर्वशी।
शब्द उर-वश से छिटकें तो,
एक-साथ कह जा, उर्वशी।

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