Sunday, June 21, 2015

ओ गीत मेरे नवसृजन करो !!

ओ मृदुल प्रीत-से गीत मेरे,
खिड़की से लिपटे, चौखट से बहते,
उन्माद भरते, मकान मन में ।

प्रिय की भीगती लटों में
राग ढूंढते, ओ मीत मेरे ।
शिलाओं से फिसलकर
अधखुले गलियारों में स्वछंद हवा
इठलाती, घरौंदे बनाती और तुम
उन घरौंदों में सरगम छेड़ते,
महकाती हवाओं में सजे,
ओ गीत मेरे ।

मिट्टी ताकती मुंडेर से छलके
भावुक दृग-जल
भावुक दृग जल से सींचते,
कुछ नवजीवन सख्त पटल पर भी।
दृष्टि को बाँधती तम की भाप,
को चूमते, सहलाते, पी जाते
आज जाकर बरखा-से बहे हो,
ओ गीत मेरे, नवसृजन करो॥    
 
 
    

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