Friday, February 27, 2015

बसंत

                 
बसंत के भंवरों का अंतर्नाद सुनता रहता हूँ 
सूखे पत्तो की सरसराहट का स्वर अब याद नही,
सहेजता समेटता नहीं दरारें मिटटी के धरातल पर
मृत तल की राख पर आवरण नये चढ़ाता हूँ। 

भर गए जख्म दीवारों के, जहाँ अपने भाव कुरेदता था,
लेप झड़ गया खंडहरों का, बिना आड़ के पत्थर चमक रहे हैं।

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