Wednesday, July 24, 2013

अज्ञात : भयागोश


अज्ञात थी तू, भयागोश में मैं,
जूझता विवेक अशक्त था |
क्या आसक्त था, तेरी सुप्तावस्था पर,
या तेरे बिम्ब उधृण, का चिरभय था ||

पर अनुभूति तेरी, जब यादें अतीत की,
दुष्कृत्य परात्मा पर, क्यों तटस्थ तू थी?
क्या तटस्थता थी उस बाह्यावेग में,
या प्रकोप था, परात्मा के श्राप का |
तटस्थ तू थी, क्यों भयागोश में मैं?                                         
क्या श्राप था वो तेरी क्रूरता को या,      
थी भयभीत खुदसे, तेरी भीरुता थी |  

फिर भी विचार निर्दोष सिद्ध करने को   
विलेन दल का राजा बन विवेक,
ललकार, अतर्कों की आड़ में तुझे |
तू ही उसका प्राण है, उसके वजूद का आह्वान है, 
फिर भी क्यों तू अनजान है, उसके कपट-जाल से |
कपटता के इस पाश में,
तू शून्य अज्ञातवासिनी है,
ना जान पाया भयागोश में, कि
तू कर्म की रागिनी है || ||  
    

   

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