Monday, October 21, 2013

पन्ने पलटता हूँ और शब्द गुम हो जाते हैं....



नींदें मुस्काती थी,
नानी की छलकती कहानियों पर
देख तारों से बाते करते थे,
रातें जागती थी साथ, ताली मारती थी हर अटखेली पर,
पर अब       
रातें बिलखती हैं, डरती हैं खुद के अंधकार से |

राग थे वहां, कुछ उन्माद से कुछ एहसास से,
जब हवाएं उठा रेत टीले को संवारती थी,
रेत भी खेलती थी, फिसलती थी साथ में,
वो टीलों के सिखर से तल का सफ़र,   
अब टीले कोसते हैं,
कोसतें हैं हवाओं को क्यों उठा ना ले जाती उन्हें ?

पैर सीख गये, वो खेलनाद पेड़ की डालों पर,
सरसराते थे पत्ते, पकड़कर हमें खुशियाँ मनाते थे,
मनुहार करता घर बुलाने की
खगों का वो जोड़ा, कितना जीवन्त था  
अब वो
पत्तें चीखते हैं, राहगीरों पर क्या उसकी छाँव इतनी बुरी है ?

सरकती मिटटी दो चप्पलों के बीच,
दीवारें बनती थी बाड़े की,
पंचशूल नन्हें हाथों का सूखी रेत में,
भेदता कण-कण, भ्रमजाल दुनिया का,
वो मिटटी भी खेलती थी,
उस चंचल हथेली पर फिसलकर,
पर अब,      
मिट्टी तरसती है उन नन्हे हाथों के स्पर्श के लिए | 


चीरकर अलग किये जाते थे पत्ते माचिसों के,
फिर भी नाचते थे मद में एक-दुसरे पर गिरकर,
गर्व करते अपने वजूद पर उन नन्ही अँगुलियों के पाश में,
कि कोई चाहता हैं उन्हें भी, उन तिल्लियों को ही नही,
पर आज   
वो माचिस
भड़कते हैं उन तिल्लियों पर, क्यों जख्मों पर बार-बार चोट करती हैं |

बरसा फूल सर पर, खुद से ही खुद का ब्याह रचाते,
वो फूल भी सहलाते बालों को, फिर उन्हीं में खो जाते,
साँझ भी खेलती थी साथ, खेल पकड़ने का,
पर वो शामें मायूस हैं आज, राह देखती हैं खुद के ढल जाने की
वो यादें सिसकती हैं,
यादें सिसकती हैं उन लम्हों को चुटकी में समेटकर, मसोसकर || 


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