Wednesday, July 3, 2013

अज्ञात : परावेग

अनजान था तुझसे, परावेग में,
निष्पंद जीवन स्थिर था।
क्या स्थिरता थी विरल विवेक में,
या तेरे शून्य रागों की जड़ता थी॥

आरम्भ तुझसे, विवेक तक,
मासूम पथ की विप्लव व्यथा।
क्या जड़ता ने ही जकड़ा था,
या थी उस पथ की अवरोध कथा।
क्या अवरोध अक्ष की दक्षता पर,
रीझता था वो परावेगदाता।
या प्रयत्न धार की जड़ता पर,
थी राह पर, खीजने की गाथा।

क्या खीजता था, उस परावेग पर,
या नादान था उसकी द्रुपता से।
विद्रुपता बनी दुर्कवच तुझ पर,
ज्ञानेंद्री श्रापित, निर्बलता से।
इस निर्बलता के दुर्वेग में,
तू शून्य, अज्ञातवासिनी है।
न जान पाया, परावेग में, कि
तू कर्म की रागिनी है॥
   

2 comments:

  1. इस निर्बलता के दुर्वेग में,
    तू शून्य, अज्ञातवासिनी है।
    न जान पाया, परावेग में, कि
    तू कर्म की रागिनी है॥
    nice.

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    1. शुक्रिया श्रीमान् !!

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