Wednesday, December 4, 2013

अ मनु ये तूने क्या किया ?

अ मनु ये तूने क्या किया ?
आरोह पथ दुर्गम लक्ष्य को,
आधार ही तेरा डोल रहा ।
तू काट रहा तू छोड़ रहा ,
तेरी ही डोर तेरा ही डेरा ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?

वक्त सागर ताल में, अंधेर निश्चित शैल को,
चंद मिथ्या चाँद तू खोज रहा ।
तू लूटा रहा, तू डूबा रहा ,
तेरी ही बस्ती, तेरी कश्ती का सवेरा ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?

तेरे रुग्ण खलिहान में, दोषी पुष्प घने थे,
पर मुझसे थोपित तेरे विवेक ने ,
गंध सुंगंध को एक किया ।
क्या सुना, क्या न सुना इनसे ,
पर झोली से पुष्प बिखेरने को ,
पूरा खलिहान ही मिटा दिया ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?




No comments:

Post a Comment